काश ऐसा होता…!

 गुज़रे वक्त पर अफ़सोस क्यों?


कई बार मैं बैठा-बैठा सोचता हूँ- काश मैंने वो गलती न की होती, वो फैसला न लिया होता, उस वक्त वैसा व्यवहार न किया होता, या वो सब कुछ क्यों किया जो अब सोचने पर गलत लगता है? ये सवाल मन से निकलते ही नहीं।


हम सब जानते हैं कि जो बीत गया, वो बदला नहीं जा सकता। फिर भी इंसान का दिमाग बार-बार उसी पुराने अध्याय में उलझा क्यों रहता है? क्यों हम बार-बार उन्हीं बीते पलों को याद करते हैं जिनका अब कोई इलाज नहीं है?


क्या वाकई ऐसा सोचते रहना कोई फ़ायदा देता है?


शायद नहीं। लेकिन फिर भी, हम सोचते हैं। हर कोई सोचता है। कोई भी इस अपराधबोध (guilt) से पूरी तरह मुक्त नहीं है।


ये इंसानी फ़ितरत है कि हम खुद को मानसिक रूप से सज़ा देते रहते हैं। हम जानते हैं कि गिरा हुआ दूध वापस बर्तन में नहीं आता, फिर भी हम उसी दूध पर आंसू बहाते रहते हैं। शायद हमें लगता है कि दुखी होने से गलती मिट जाएगी। पर सच्चाई ये है- गलती दुख से नहीं, सुधार से मिटती है।


एक बात मैंने अनुभव से सीखी है- वक़्त को कोसने से बेहतर है अपने रास्ते को सुधार लेना।


गलतियां सबसे होती हैं। निर्णय गलत निकल सकते हैं। लोग धोखा दे सकते हैं। मौके छिन सकते हैं। और हां, हमसे भी चूक हो सकती है। लेकिन ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत बात यही है कि वो हमेशा हमें एक नया मौका देती है।


कोई भी बुरी परिस्थिति सुधारी जा सकती है, अगर हम दिल से उसे सुधारने की कोशिश करें। दोषारोपण, पछतावा या आत्मग्लानि में जीने से अच्छा है कि हम अपनी ऊर्जा सही दिशा में लगाएं।


बीता हुआ पल वापस नहीं आएगा, लेकिन नया पल ज़रूर आएगा। हर दिन, हर सुबह, एक नई शुरुआत का मौका लेकर आती है। अतीत की गलती को हम वर्तमान की सच्चाई से ठीक कर सकते हैं।


गुज़रे पलों का पछतावा हमें बेहतर बना सकता है- अगर हम चाहें। उसे कड़वाहट नहीं, सबक बनाएं।


गिरे हुए दानों को समेटना मुश्किल है, पर बचे हुए अनाज से फिर से कुछ नया पकाया जा सकता है।


तो अगली बार जब मन अपराधबोध में डूबने लगे, उससे भागिए मत। उसे समझिए, स्वीकार कीजिए, और फिर धीरे-धीरे आगे बढ़िए। जब तक जीवन है, तब तक उम्मीद है। और जब तक उम्मीद है, तब तक सुधार संभव है।


– डॉ. सुनील सिंह राणा

(ज़िंदगी के अनुभवों से)

Comments